Sunday, December 28, 2008

हज़ार टुकडों में बट गई हूँ मैं,
कुछ इधर कुछ उधर ....
नाम के लिए जी रही हूँ,
हज़ार सालों से, सदियों से

मैंने जैसे खून से महेंदी लगायी है...
मैंने जैसे आँसू जेवर बनाये हैं...

बरखा

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