Sunday, December 28, 2008

हज़ार टुकडों में बट गई हूँ मैं,
कुछ इधर कुछ उधर ....
नाम के लिए जी रही हूँ,
हज़ार सालों से, सदियों से

मैंने जैसे खून से महेंदी लगायी है...
मैंने जैसे आँसू जेवर बनाये हैं...

बरखा

Saturday, December 06, 2008

अकेलापन

अकेलेपन का कोई मोल नही रहा....
अनजानी गहरायिओं में कभी बहुत सस्ते में मिलता था....

आजकल तो लोगों की भीड़ में
बिना किसी मोल के मिलता है, खरीदना भी नही पड़ता....

बरखा